April 21, 2024
Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya

Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya, सबके कल्याण की कामना करती सनातन संस्कृति

(ललितपुर) Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya – तुवन मंदिर प्रांगण में साकेतवासी महामंडलेश्वर श्री बालकृष्ण दास जी महाराज की पुण्य स्मृति में आयोजित महामहोत्सव के अंतर्गत तृतीय दिवस रामकथा में व्यासपीठ पर आसीन जगदगुरू द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर डा. राजेंद्र दास देवाचार्य महाराज ने कहा कि सनातन संस्कृति सबके कल्याण की कामना करती है। हम विश्व बंधुत्व एवं संसार को परिवार मानते हैं। हमारे यहां वर्ण व्यवस्था घृणात्मक नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज संचालन की यह श्रेष्ठ व्यवस्था है।

इस विराट पुरूष की गति चतुर्थ वर्ण से ही है। हमारे यहां जो सम्मान बड़े-बड़े माननीयों को मिला है। वहीं, सम्मान संत रैदास जी को प्राप्त है। सबका कल्याण हमारा मूलमंत्र है।

Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya – जब कल्याण की गारंटी सभी की है तो जातिगम विद्वेष कैसा, सामाजिक समरसता के लिए संपूर्ण हिंदु जाति भगवत भक्त बन जाए, सबके मस्तिष्क पर सुंदर तिलक हो, सबके गले में कंठी हो, सबके ह्दय में प्रभुराम रहें।

मुख में प्रभु नाम रहे तो समरसता के साथ रामराज्य की परिकल्पना साकार हो जाएगी। जो परिकल्पना हमारे पूर्वजों एवं क्रांतिकारियों ने की थी, जब सबके मुख में राम नाम होगा तो आपस में द्वेष नहीं रहेगा।

समदर्शी होने पर ही समरसता प्रकट होगी। श्री रामचरित मानस के अयोध्याकांड की कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए महाराज ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम के युवराज पद की तैयारियां चल रही थी.

तभी गुरू वशिष्ठ राम जी के महल में पधारे, प्रभु राम ने गुरू वरिष्ठ को स्वामी और स्वयं को सेवक कहते हुए कहा कि आपका आगमन मंगल मूलक एवं अमंगलों का नाश करने वाला है। पद प्राप्त करने वाले की ऐसी विनम्रता राम जी के चरित्र में ही मिलती है।

गुरू वरिष्ठ ने संयम आदि साधन करने की बात कही। यहां प्रभु श्रीराम के मन में पश्चाताप प्रकट हुआ कि हम चारों भाई एक साथ जन्में। हमारा लालन पालन साथ-साथ हुआ, हम सभी एक साथ पढ़े, हम चारों एक साथ बढ़े हुए। यहां तक कि हम सभी का विवाह भी साथ-साथ हुआ, फिर भी राज्याभिषेक मेरा क्यों। यह पश्चाताप सारी समस्याओं को मिटाने वाला है।

Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya – गोस्वामी जी ने भगवान राम के इस पश्चाताप से भक्तों के मन की कुटिलता दूर होती है। अयोध्या में संपूर्ण रात उत्सव चलते रहे। अवधवासियों को आनंद में देकर देवता चिंतित हो गए कि यदि राम युवराज बन गए तो उनका अवतार कार्य कैसे पूर्ण होगा.

यह अपनी व्यथा लेकर देवता भगवती सरस्वती के पास गए। उनसे विनय की कि किसी तरह राम जी का अभिषेक न हो और वे वन चले जाएं। राम जी वन गए, तभी वे बन गए क्योंकि राम जी के रामत्व का प्रकटीकरण तो बन में ही होना था।

Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya – भगवती सरस्वती अयोध्यावासियों पर अपना जादू नहीं चला सकी क्योंकि जब ह्दय में लबालब प्रभु प्रेम भरा हो तो ईर्ष्या या द्वेष का कोई स्थान नहीं रहता है। जब चित्त में रामकृष्ण, नारायण हो तो उस चित्त में भेद नहीं रहता, इसलिए सरस्वती ने मंथरा को चुना क्योंकि मंथरा पूर्वतया हरि भक्ति में लीन नहीं रही होगी,

मंथरा ने कौशल्या महल, नगर की सजावट व नगरवासियों को आनंद उल्लास देखा तो उसने महारानी कैकेयी के ह्दय में भेद डाला। पहले तो महारानी कैकेयी ने उसे फटकारा लेकिन मंथरा का कुसंग कैकेयी को प्रभावित कर गया। कुसंग से व्यक्ति पतित हो जाता है।

कुसंग होने से जीवन में सत्संग नहीं आ सकता है। दीर्घकाल का कुसंग त्याग करने से एक क्षण का सत्संग भी जीवन बदल सकता है। मंथरा के कुसंग से ही कैकेयी की मति में भेद आया और वह दो वरदान मांगने को राजी हुई। इसे लेकर कोपभवन में चली गई।

महाराज दशरथ जानते थे कि कैकेयी स्वयं राम जी को बहुत स्नेह करती हैं, अतरू उन्हें यह समाचार सुनाने मैं स्वयं जाऊंगा। महाराजा दशरथ के आगमन पर कोप भवन में जाकर उन्होंने कैकेयी को मनाने का प्रयास किया।

कैकेयी ने दो वरदान एक में भरत को राजतिलक व दूसरे में वनवासी वेश में राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगा। महाराजा दशरथ वरदान सुनकर अचेत हो गए महंत गंगादास महाराज ने कथा में पधारे संतों की अगवानी कर मंचासीन कराया।

मंचासीन महंतों में जगदगुरू पीपा द्वाराचार्य बलराम दास जी महाराज वृंदावन, महंत रामबालकदास, महंत श्यामसुंदरदस, सच्चिदानंद दास, राघवेंद्र दास, शिवराम दास, अशोक नारायण दास, रामलखन दास आदि विराजमान रहे।

सदगुणों का विचार ईमानदारी से करेंगे तो द्वेष मिटेगा

महाराज जी ने कहा कि भक्ति का सूत्र ही है कि मात्सर्य भाव से हटकर भजन करना। जब तक जीवन में ईर्ष्या या द्वेष रहेगा, कितने भी साधन कर लो, भक्ति नहीं आएगी। ईर्ष्या या द्वेष की निवृत्ति के लिए आवश्यक है कि हम सबके ह्दय में परमात्मा का दर्शन करें।

जब सबमें राम हैं तो ईर्ष्या या द्वेष कैसा। हम जीवन में एक सिद्धांत बनाए कि जो हमसे किसी भी क्षेत्र में श्रेष्ठ हों, उसमें मनुज भाव न मानें, उसे श्रेष्ठ मानव जानेंगे तो ईर्ष्या उत्पन्न नहीं होगी। स्वयं के दोष एवं दूसरे के सदगुणों का विचार ईमानदारी से करेंगे तो द्वेष मिटेगा।

Peethadheeshwar Rajendra Das Devacharya – संत जहां जाते हैं, वहीं तीर्थ बन जाताःदीदी

धर्मसभा में श्रीराम जन्म भूमि मुक्ति में अग्रीण भूमिका का निर्वाह करने वाली वात्सल्य जैसी ममतामयी संस्था चलाने वाली साध्वी ऋतम्बरा दीदी ने कहा कि कोई भी समस्या बड़ी नहीं होती है, उसके समाधान का तरीका आना चाहिए। हम भगवान राम के वंशज हैं।

हम ऋषियों की संतान हैं। हम जाग्रत बनें, आपसी भेद हमारी दृष्टि में नहीं होना चाहिए। जाग्रत समाज ही क्रूरता को नष्ट कर सकता है। यह संतों का देश है, प्रत्येक जीव में परमात्मा का दर्शन हमारा सिद्धांत है। संत जहां जाते हैं, वहीं तीर्थ बन जाता है। नामदेव जी ने रोटी बनाकर रखी, जिसे श्वान लेकर भागा।

नामदेव जी उसके पीछे लाठी लेकर नहीं बल्कि घी का पात्र लेकर दौड़े और कहा कि रोटी में घी तो लगाकर खाइये, यही सनातन संस्कृति है। आज राम मंदिर धूमधाम से बन रहा है। हमें जीवन में हताशा नहीं लाना चाहिए बल्कि स्वयं को जीतना चाहिए।

समाज में समता-समरसता धर्मक्रांति से आती है। स्वयं को जानो, मर्यादायुुक्त जीवन जियो, यह तभी होगा, जब प्रभु राम के चरित्र को जीवन में उतारा जाए। दीदी ऋतम्बरा ने लगभग बत्तीस वर्ष पूर्व के संस्मरण को भी सुनाया, जब वह राम मंदिर आंदोलन में जनपद पधारी और तुवन मंदिर प्रांगण में जनसभा की तो उनके पीछे पुलिस लग गई।

तब वह एक गांव की महिला बनकर एक बच्चे को लेकर पुलिस की नजरों से बचने में कामयाब रही थी। उस समय के भाजपा जिलाध्यक्ष रामकुमार तिवारी ने इस संपूर्ण प्रकरण में उनकी मदद की थी।

रामकथा के तृतीय सत्र में बागेश्वर धाम सरकार के श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का मंगल आगमन हुआ। उन्होंने कहा कि मेरे दादा गुरू कहते थे कि चंदन कट जाने पर जैसे अपनी सुगंध नहीं छोड़ता, उसी प्रकार संतजन भी सशरीर न भी रहे तो उनकी आभा, उनकी कृपा, उनकी करूणा, उनका आशीष सदैव बना रहता है।

पूज्य श्री बालकृष्ण दास महाराज की स्मृति इसका प्रमाण है। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस को यदि मानस चरित राम कहें तो स्पष्ट है कि मानव अपने चरित्र से राम बन सकता है। जैसे प्रकाश आने पर अंधकार चला जाता है तो उसी प्रकार नाम सुमिरन करने से, कथा श्रवण करने से पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रेष्ठ चरित्र से विश्व पूज्य बना जा सकता है।

यही श्रेष्ठ चरित्र प्रभु राम में देखने को मिलता है। भाई से भाई, पुत्र से पिता, पिता से पुत्र, प्रजा से राजा, राजा से प्रजा, पति-पत्नि, स्वामी सेवक इन संबंधों की मर्यादा इस कथा से सीखी जा सकती है। राम हमारे जीवन हैं, हमारा अस्तित्व ही प्रभु राम से ही है। जीवन में सुख संपत्ति बढ़े तो भजन बढ़ाओ। जीवन की हर परिस्थिति में राम से नाता जुड़ा रहना चाहिए।

व्यासपीठ पर विराजमान मलूक पीठाधीश्वर को पिता तुल्य बताते हुए कहा कि पिता के सम्मुख पुत्र क्या बोले, जिस प्रकार मां के उच्चारण से मुख खुला रहता है, जब बाप के उच्चारण से मुख बंद हो जाता है। यही कारण है कि मैं अधिक क्या कहूं।

कथा का श्रवण करने वालों में प्रमुख रूप से सदर विधायक रामरतन कुशवाहा, प्रदीप चौबे, डा. ओमप्रकाश शास्त्री, आदित्यनारायण बबेले, अजय तिवारी नीलू, प्रेस क्लब अध्यक्ष राजीव बबेले, रामेश्वर सड़ैया, वीरेंद्र सिंह वीके सरदार, नरेश शेखावत, धर्मेंद्र रावत, गिरीश पाठक सोनू, विवेक सड़ैया, राजेश दुबे, भाजपा जिलाध्यक्ष राजकुमार जैन,

संजय डयोडिया, सुभाष जायसवाल, विलास पटैरिया, उदित रावत, प्रदीप खैरा, प्रदीप गुप्ता, शरद खैरा, जिला पंचायत अध्यक्ष कैलाश निरंजन, पालिकाध्यक्ष रजनी साहू, हरीराम निरंजन, राजेश यादव, अनूप मोदी, चंद्रविनोद हुंडैत, सुधांशु शेखर हुंडैत, विभाकांत हुंडैत, ह्देश हुंडैत, गोपी डोडवानी, कपिल डोडवानी, रमाकांत तिवारी, गंधर्व सिंह लोधी,

सौरभ लोधी, अजय पटैरिया, अशोक रावत, बब्बूराजा, अजय नायक, मनीष अग्रवाल, हाकिम सिंह, गोलू पुरोहित, आदित्य पुरोहित, बद्रीप्रसाद पाठक, मुकुट बिहारी उपाध्याय, राजीव सुड़ेले, सुबोध गोस्वामी, डा. राजकुमार जैन, रामकिशोर द्विवेदी, उमाशंकर विदुआ, विष्णु अग्रवाल, गोविंद नारायण रावत,

दुर्गाप्रसाद पाठक, कमलापति रिछारिया, देवेंद्र चतुर्वेदी, दिनेश गोस्वामी, चंद्रशेखर पंथ, डा. दीपक चौबे, भगवत नारायण वाजपेई, ओपी रिछारिया, वीरेंद्र शेखावत, अंतिम जैन, राहुल शुक्ला, सुनील सैनी, राजेश लिटौरिया, आशीष रावत, प्रशांत शुक्ला,

अजय जैन साइकिल, भरत रिछारिया, मनीष दुबे, विक्रांत तोमर, कमलेश शास्त्री, राहुल खिरिया, सतेंद्र सिसौदिया, डा प्रबल सक्सेना, नेपाल यादव, बृजेश चतुर्वेदी, कल्पनीत लोधी, गोलू चौबे, रामकुमार सोनी, अजय जैन साईकिल, बबलू पाठक, वीके तिवारी, शंकरदयाल भौड़ेले,

मथुरा प्रसाद सोनी, सज्जन शर्मा,चंदे साहू, प्रताप नारायण गोस्वामी, राहुल चौबे, दीपक रावत, वीरेंद्र पुरोहित, नीरज मिश्रा, राजेश लिटौरिया, गौरव गौतम, रविकांत तिवारी, पार्थ चौबे, नीरज शर्मा, देवेंद्र गुरू, राजेंद्र वाजपेई, बाबी राजा, भोलू रावत,

श्रीकांत करौलिया, रामकुमार सोनी, दिवाकर शर्मा, आलोक श्रीवास्तव, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी, भूपेंद्र तिवारी, चंद्रशेखर दुबे, मानू शर्मा, अंकुर रावत, शुभम कौशिक, नत्थू राठौर आदि हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

रामार्चन से बड़ा कोई सिद्धि पद साधन नहीं

श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर में आयोजित स्मृति महामहोत्सव में मंगल मंडप सजाया गया। श्री सीताराम महाराज की शास्त्रीय विधि विधान से प्रथमवार नगर में रामार्चा संपन्न कराया गया।

मलूकपीठाधीश्वर महाराज ने बताया कि रामार्चन का वर्णन शिव संहिता में है। भगवानभूत भावन शिव ने जगदंबा पार्वती को रामार्चन महायज्ञ का वृतांत सुनाया। वह कहते हैं कि श्री रामार्चन यज्ञ से ही शक्ति पाकर ब्रह्मा सृष्टि का निर्मा करते हैं। भगवान विष्णु संसार का पालन करते हैं।

मैं स्वयं इससे शक्ति पाकर संसार में मुक्ति प्रदान करता हूं। रामार्चन से बड़ा कोई सिद्धि पद साधन नहीं है। यह महायज्ञ सकल कामनाओं को देने वाला है। जीवन की कामनाओं की पूर्ति, असाध्य रोगों से मुक्ति का भी यही साधन है।


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